March 21, 2026 | Astrology

Ekadashi Vrat Kab Hai? Aaj Ki Shubh Tithi Aur Paaran Samay

एकादशी व्रत कब है? आज की शुभ तिथि और पारण समय...

एकादशी व्रत कब है? आज की शुभ तिथि और पारण समय

नमस्कार मित्रों! मैं अभिषेक सोनी, abhisheksoni.in पर आप सभी का हृदय से स्वागत करता हूँ। आज हम एक ऐसे पावन और महत्वपूर्ण विषय पर बात करने जा रहे हैं, जो हमारी भारतीय संस्कृति और आध्यात्म का एक अभिन्न अंग है – एकादशी व्रत। अक्सर मेरे पास यह प्रश्न आता है, "गुरुजी, एकादशी व्रत कब है?" या "आज की एकादशी तिथि क्या है और इसका पारण कब होगा?" आपकी इन सभी जिज्ञासाओं का समाधान करने और इस दिव्य व्रत के गूढ़ रहस्यों को समझने के लिए, आज मैं आपके साथ अपनी ज्योतिषीय अंतर्दृष्टि और अनुभव साझा करूँगा।

एकादशी का दिन भगवान विष्णु को समर्पित होता है। यह सिर्फ एक उपवास नहीं, बल्कि आत्म-शुद्धि, मन की एकाग्रता और आध्यात्मिक उन्नति का एक सशक्त माध्यम है। आइए, इस पवित्र यात्रा पर चलें और एकादशी के हर पहलू को गहराई से जानें।

आज का एकादशी व्रत: एक आध्यात्मिक यात्रा का प्रारंभ

एकादशी क्या है?

सनातन धर्म में एकादशी का अत्यधिक महत्व है। यह हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक चंद्र मास में दो बार आती है – एक कृष्ण पक्ष (अमावस्या के बाद) में और दूसरी शुक्ल पक्ष (पूर्णिमा के बाद) में। इस प्रकार, एक वर्ष में कुल 24 एकादशियां होती हैं, और प्रत्येक एकादशी का अपना विशेष नाम और महत्व है। यह तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है, और इस दिन व्रत रखने, पूजा-पाठ करने और दान करने से मनुष्य को कई प्रकार के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं।

मेरा आपसे व्यक्तिगत संवाद

प्रिय पाठकों, मैं समझता हूँ कि आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में पंचांग देखना और सही तिथि का निर्धारण करना थोड़ा जटिल हो सकता है। इसीलिए, मैं यहाँ आपको सरल भाषा में यह समझाने का प्रयास करूंगा कि एकादशी व्रत का सही समय और विधि क्या है। मेरा उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि आपको इस पावन व्रत से जुड़ने और इसके पूर्ण लाभ प्राप्त करने में सहायता करना है। यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है कि जब हम श्रद्धा और सच्चे मन से कोई कार्य करते हैं, तो उसका फल अवश्य मिलता है।

एकादशी व्रत का महत्व और लाभ

एकादशी व्रत को सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना गया है। स्कंद पुराण और गरुड़ पुराण जैसे शास्त्रों में इसकी महिमा का विस्तार से वर्णन है। यह सिर्फ अन्न-जल त्यागने तक सीमित नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म से पवित्रता धारण करने का पर्व है।

शारीरिक लाभ

  • पाचन तंत्र में सुधार: उपवास करने से पाचन तंत्र को आराम मिलता है, जिससे शरीर में जमा विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं।
  • ऊर्जा का स्तर बढ़ना: शरीर की ऊर्जा भोजन पचाने में कम खर्च होती है, जिससे आंतरिक ऊर्जा का स्तर बढ़ता है।
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता: नियमित उपवास शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है।

मानसिक और आध्यात्मिक लाभ

  • मन की शांति: व्रत के दौरान ध्यान और प्रभु स्मरण से मन शांत होता है, चिंताएं कम होती हैं।
  • आत्म-नियंत्रण: यह हमें अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण रखना सिखाता है, जो आत्म-विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • मोक्ष की प्राप्ति: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धापूर्वक एकादशी व्रत करने से पापों का नाश होता है और व्यक्ति मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होता है।
  • भगवान विष्णु का आशीर्वाद: यह व्रत भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है, और इसे करने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।

एकादशी तिथि का निर्धारण: पंचांग और शुभ मुहूर्त

एकादशी की तिथि का निर्धारण ज्योतिषीय गणनाओं और पंचांग के आधार पर होता है। इसमें तिथि का क्षय या वृद्धि भी एक महत्वपूर्ण कारक होता है।

दो एकादशियां: स्मार्त और भागवत

कभी-कभी एक ही महीने में दो एकादशियां दिखाई देती हैं। इस स्थिति में, वैष्णव (भागवत परंपरा के अनुयायी) और स्मार्त (स्मृति के अनुयायी) अलग-अलग दिनों में व्रत रखते हैं।

  • स्मार्त एकादशी: जो लोग सूर्योदय के समय दशमी तिथि से युक्त एकादशी को मानते हैं।
  • भागवत एकादशी: जो लोग द्वादशी युक्त एकादशी को प्राथमिकता देते हैं।

यह अंतर मुख्य रूप से तिथि के आरंभ और समाप्ति के समय के कारण होता है। आमतौर पर, जिस दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि हो, उसी दिन व्रत रखा जाता है। हालाँकि, यदि दशमी तिथि एकादशी के साथ मिलकर 'विदधा' या 'दशमी विद्धा' एकादशी बनती है, तो अगले दिन व्रत रखा जाता है। निर्णय सिंधु जैसे ग्रंथों में दशमी विद्धा एकादशी को त्यागने का विधान है।

तिथि क्षय और वृद्धि का प्रभाव

ज्योतिष में तिथियों का क्षय (कम होना) या वृद्धि (बढ़ना) होता रहता है। जब कोई तिथि 24 घंटे से कम या अधिक समय तक रहती है, तो यह क्षय या वृद्धि कहलाती है। एकादशी के संदर्भ में, यदि दशमी तिथि इतनी देर तक रहती है कि सूर्योदय के समय एकादशी केवल कुछ घंटों के लिए ही हो और उसके बाद द्वादशी लग जाए, तो अक्सर अगले दिन व्रत रखा जाता है, ताकि पारण का समय द्वादशी में ही मिल सके।

आज की एकादशी तिथि: विवरण और संकल्प

प्रिय पाठकों, जैसा कि मैं एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता हूँ और वास्तविक समय की ज्योतिषीय गणनाएँ नहीं कर सकता, मैं आपको आज की एकादशी तिथि का सीधा विवरण नहीं दे सकता। हालाँकि, आप अपने स्थानीय पंचांग, किसी विश्वसनीय ज्योतिष ऐप, या abhisheksoni.in पर दिए गए मासिक पंचांग कैलेंडर के माध्यम से आज की एकादशी तिथि का सटीक विवरण प्राप्त कर सकते हैं।

मान लीजिए कि आज (या जिस दिन आप यह लेख पढ़ रहे हैं) कोई एकादशी है। तो आपको सबसे पहले यह देखना होगा कि यह किस पक्ष की एकादशी है (कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष) और इसका क्या नाम है (जैसे निर्जला, देवशयनी, पुत्रदा आदि)। प्रत्येक एकादशी का अपना एक विशेष फल और कथा होती है।

पंचांग से जानें आज की स्थिति

  1. अपने मोबाइल पर कोई भी विश्वसनीय पंचांग ऐप खोलें।
  2. आज की तारीख चुनें और 'तिथि' वाले खंड में देखें।
  3. यदि वहां 'एकादशी' लिखा है, तो इसका अर्थ है कि आज एकादशी है।
  4. साथ ही, 'नक्षत्र,' 'योग,' और 'करण' भी देखें, क्योंकि ये भी व्रत के प्रभाव को निर्धारित करते हैं।

पारण का समय भी पंचांग में ही स्पष्ट रूप से दिया जाता है। यह द्वादशी तिथि के समाप्त होने से पहले का होता है।

संकल्प का महत्व

व्रत शुरू करने से पहले संकल्प लेना अत्यंत महत्वपूर्ण है। संकल्प का अर्थ है दृढ़ निश्चय। इससे आपका मन और शरीर व्रत के लिए तैयार होता है और आपको उसका पूरा फल प्राप्त होता है।

  • सुबह स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के सामने बैठकर हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर संकल्प लें।
  • कहें: "मैं (अपना नाम), आज (एकादशी का नाम) एकादशी का व्रत कर रहा/रही हूँ। हे भगवान विष्णु, मेरी इस व्रत को निर्विघ्न संपन्न कराने में सहायता करें और मुझे इसका पूर्ण फल प्रदान करें।"
  • जल को जमीन पर छोड़ दें।

यह संकल्प आपको अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहने में मदद करेगा।

व्रत विधि: एकादशी का पालन कैसे करें?

एकादशी व्रत की विधि दशमी तिथि से ही प्रारंभ हो जाती है और द्वादशी तक चलती है। यह तीन दिनों का एक पवित्र अनुष्ठान है।

दशमी से तैयारी

  • एक दिन पहले: दशमी के दिन से ही सात्विक भोजन ग्रहण करें। मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन और मसूर की दाल का त्याग कर दें।
  • एक बार भोजन: दशमी को सूर्यास्त से पहले केवल एक बार भोजन करें।
  • ब्रह्मचर्य: दशमी की रात्रि से ही ब्रह्मचर्य का पालन करें।

एकादशी के दिन

  1. सूर्योदय से पहले स्नान: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. पूजा और संकल्प: भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाकर, धूप-अगरबत्ती करें। पीले फूल, तुलसी दल, फल और मिठाई अर्पित करें। संकल्प लें।
  3. मंत्र जाप: "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का अधिक से अधिक जाप करें। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना भी अत्यंत शुभ होता है।
  4. फलाहार या निर्जला: अपनी क्षमतानुसार व्रत करें। यदि निर्जला (जल के बिना) संभव न हो, तो फल, दूध, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा जैसे सात्विक पदार्थ ग्रहण कर सकते हैं।
  5. दान: इस दिन अपनी सामर्थ्य अनुसार गरीबों और जरूरतमंदों को दान अवश्य करें। अन्न, वस्त्र या धन का दान विशेष फलदायी होता है।
  6. जागरण: यदि संभव हो, तो रात्रि में जागरण कर भगवान विष्णु के भजन-कीर्तन करें।

द्वादशी को पारण

द्वादशी तिथि पर ही व्रत का पारण किया जाता है। पारण का अर्थ है व्रत को समाप्त करना।

एकादशी पारण: सही समय और नियम

एकादशी व्रत का पारण सही समय और नियमों के अनुसार करना अति आवश्यक है, अन्यथा व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। पारण हमेशा द्वादशी तिथि के भीतर ही करना चाहिए और हरि वासर समाप्त होने के बाद।

पारण मुहूर्त का महत्व

हरि वासर, एकादशी तिथि के अंतिम एक-चौथाई समय को कहा जाता है। इस अवधि में पारण करना वर्जित होता है। पारण का सबसे शुभ समय द्वादशी तिथि के सूर्योदय के बाद और हरि वासर समाप्त होने के बाद का होता है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय के तुरंत बाद समाप्त हो रही हो, तो हरि वासर समाप्त होने के बाद ही पारण कर लेना चाहिए, भले ही द्वादशी थोड़ी ही देर के लिए क्यों न हो।

आज के लिए (या जिस एकादशी के लिए आप देख रहे हैं), पारण का सटीक समय पंचांग में स्पष्ट रूप से दिया गया होगा। उदाहरण के लिए, यदि एकादशी आज समाप्त हो रही है, तो कल सुबह (द्वादशी के दिन) पारण का समय होगा।

पारण कैसे करें?

  1. स्नान: द्वादशी के दिन सुबह स्नान आदि से निवृत होकर शुद्ध हो जाएं।
  2. भगवान को भोग: भगवान विष्णु को भोग लगाएं और उनकी आरती करें।
  3. दान: यदि संभव हो तो किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराएं या दान दें।
  4. पारण का भोजन: पारण हमेशा सात्विक भोजन से करें। चावल, दाल, हरी सब्जियां (जो एकादशी में वर्जित नहीं थीं) और मिठाई ले सकते हैं।
  5. तुलसी पत्र: पारण से पहले एक तुलसी पत्र ग्रहण करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

महत्वपूर्ण: भूलकर भी एकादशी के दिन पारण न करें। यह द्वादशी तिथि में ही होना चाहिए।

एकादशी के दौरान ध्यान रखने योग्य बातें

क्या खाएं और क्या नहीं?

  • खाएं: फल, दूध, दही, मखाने, आलू, शकरकंद, सिंघाड़े का आटा, कुट्टू का आटा, सेंधा नमक, काली मिर्च, अदरक, लौंग, इलायची, जीरा (कुछ परंपराओं में)।
  • न खाएं: चावल, गेहूं, दालें (चना, मसूर, उड़द), प्याज, लहसुन, मांसाहार, शराब, तम्बाकू, सामान्य नमक, हींग, राई।

क्या करें और क्या न करें?

क्या करें:

  • भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करें।
  • तुलसी के पौधे की पूजा करें और जल चढ़ाएं।
  • दान करें।
  • शांत रहें और क्रोध से बचें।
  • मन को पवित्र विचारों में लगाएं।

क्या न करें:

  • झूठ न बोलें, निंदा न करें।
  • किसी का अपमान न करें।
  • बाल न कटवाएं और नाखून न काटें।
  • शारीरिक संबंध न बनाएं।
  • किसी भी प्रकार के नशे से दूर रहें।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण से एकादशी का प्रभाव

ज्योतिष शास्त्र में एकादशी तिथि का गहरा संबंध चंद्रमा से माना जाता है। चंद्रमा मन का कारक है और एकादशी तिथि पर चंद्रमा की स्थिति विशेष होती है, जो हमारे मन और शरीर पर प्रभाव डालती है।

ग्रहों से संबंध

एकादशी का व्रत करने से चंद्रमा, बृहस्पति और शुक्र ग्रह मजबूत होते हैं।

  • चंद्रमा: मन की शांति, मानसिक स्थिरता और भावनाओं पर नियंत्रण में मदद करता है।
  • बृहस्पति (गुरु): ज्ञान, बुद्धि, समृद्धि और धर्म-कर्म में वृद्धि करता है।
  • शुक्र: भौतिक सुख-सुविधाओं, प्रेम और संबंधों में सामंजस्य लाता है।

जो लोग इन ग्रहों से संबंधित समस्याओं का सामना कर रहे हैं, उनके लिए एकादशी व्रत अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकता है।

राशियों पर प्रभाव

प्रत्येक एकादशी का किसी न किसी राशि पर विशेष प्रभाव होता है, हालाँकि इसका मूल उद्देश्य सभी के लिए समान है – भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करना। ज्योतिषीय विश्लेषण के अनुसार, यदि आपकी कुंडली में कोई ग्रह दोष है या आप किसी विशेष समस्या से जूझ रहे हैं, तो संबंधित एकादशी का व्रत और उसके विशिष्ट उपाय करने से आपको राहत मिल सकती है। उदाहरण के लिए, संतान प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का महत्व है।

एकादशी के विशेष उपाय और अनुष्ठान

एकादशी के दिन कुछ विशेष उपाय और अनुष्ठान करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है:

विष्णु सहस्त्रनाम पाठ

भगवान विष्णु के 1000 नामों का यह दिव्य पाठ करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और संकट दूर होते हैं। एकादशी के दिन इसे करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।

तुलसी पूजन

एकादशी पर तुलसी के पौधे की पूजा करना और संध्या के समय उसके नीचे दीपक जलाना शुभ माना जाता है। भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है, इसलिए उन्हें तुलसी दल अर्पित करना न भूलें।

दान का महत्व

इस दिन अन्न, वस्त्र, जल या धन का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। गायों को चारा खिलाना, पक्षियों को दाना डालना भी विशेष फल देता है। अपनी सामर्थ्य अनुसार दान अवश्य करें।

एकादशी व्रत के प्रकार और उनका महत्व

वर्ष की प्रत्येक एकादशी का अपना एक विशिष्ट नाम और महत्व है। कुछ प्रमुख एकादशियां इस प्रकार हैं:

निर्जला एकादशी

यह ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में आती है और इसे सभी एकादशियों में सबसे कठिन माना जाता है। इस दिन जल का भी त्याग किया जाता है। मान्यता है कि इस एक एकादशी का व्रत करने से सभी 24 एकादशियों का फल प्राप्त होता है।

पुत्रदा एकादशी

यह दो बार आती है – एक श्रावण शुक्ल पक्ष में और दूसरी पौष शुक्ल पक्ष में। संतानहीन दंपत्तियों के लिए यह व्रत विशेष फलदायी माना जाता है।

मोक्षदा एकादशी

मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में आने वाली यह एकादशी मोक्ष प्रदान करने वाली मानी जाती है। इसी दिन भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था, इसलिए इसे गीता जयंती के नाम से भी जाना जाता है।

अन्य प्रमुख एकादशियां

  • देवशयनी एकादशी: आषाढ़ शुक्ल पक्ष की यह एकादशी भगवान विष्णु के क्षीरसागर में शयन का आरंभ करती है।
  • देवउठनी एकादशी: कार्तिक शुक्ल पक्ष की यह एकादशी भगवान विष्णु के चार माह के शयनकाल के बाद जागने का प्रतीक है। इस दिन से मांगलिक कार्य पुनः प्रारंभ होते हैं।
  • अजा एकादशी: भाद्रपद कृष्ण पक्ष की यह एकादशी पापों का नाश करने वाली मानी जाती है।
  • आमलाकी एकादशी: फाल्गुन शुक्ल पक्ष की यह एकादशी आंवले के वृक्ष से संबंधित है और आरोग्य प्रदान करती है।

प्रत्येक एकादशी की अपनी कथा और विशिष्ट विधि है, जिसका पालन करने से साधक को विशेष लाभ मिलते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: क्या एकादशी व्रत सभी के लिए अनिवार्य है?

नहीं, एकादशी व्रत अनिवार्य नहीं है, लेकिन यह आध्यात्मिक उन्नति और पुण्य प्राप्ति के लिए अत्यंत लाभकारी है। बीमार व्यक्ति, बच्चे, वृद्ध और गर्भवती महिलाएं अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार व्रत के नियमों में ढील दे सकते हैं या केवल सात्विक भोजन ग्रहण कर सकते हैं। श्रद्धा और मन की पवित्रता सबसे महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 2: गर्भवती महिलाएं एकादशी व्रत कैसे रखें?

गर्भवती महिलाओं को निर्जला व्रत नहीं रखना चाहिए। वे फलाहार, दूध, फल और सात्विक भोजन ग्रहण कर सकती हैं। वे भगवान का स्मरण करें, मंत्र जाप करें और मन को शांत रखें। स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना अत्यंत महत्वपूर्ण है। चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

प्रश्न 3: एकादशी के दिन चावल क्यों नहीं खाते?

पौराणिक मान्यता के अनुसार, एकादशी के दिन चावल खाने से अगले जन्म में कीड़े-मकौड़ों का जन्म मिलता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, चावल में जल तत्व अधिक होता है और चंद्रमा का जल तत्व पर प्रभाव अधिक होता है। एकादशी पर मन को शांत और स्थिर रखने के लिए ऐसे खाद्य पदार्थों से बचने की सलाह दी जाती है जो मन को चंचल कर सकते हैं।

प्रश्न 4: एकादशी व्रत तोड़ने पर क्या करना चाहिए?

यदि किसी कारणवश एकादशी व्रत टूट जाए, तो भगवान विष्णु से क्षमा याचना करें। अगले एकादशी व्रत में और अधिक सावधानी बरतने का संकल्प लें। आप अपनी सामर्थ्य अनुसार किसी मंदिर में दान कर सकते हैं या गरीबों को भोजन करा सकते हैं।

अंतिम विचार: एकादशी - आत्म-शुद्धि का महापर्व

प्रिय मित्रों, एकादशी का व्रत केवल एक दिन का उपवास नहीं, बल्कि यह हमें अपने भीतर झांकने, अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण पाने और भगवान विष्णु के प्रति अपनी श्रद्धा को प्रगाढ़ करने का एक सुनहरा अवसर प्रदान करता है। यह आत्म-अनुशासन, त्याग और समर्पण का पर्व है। चाहे आप किसी भी समस्या से जूझ रहे हों या केवल आध्यात्मिक शांति की तलाश में हों, एकादशी का व्रत आपको एक नई दिशा और ऊर्जा प्रदान कर सकता है।

तो, जब भी आपके मन में प्रश्न आए "एकादशी कब है?" या "आज की एकादशी का पारण समय क्या है?", तो हमेशा एक विश्वसनीय पंचांग का सहारा लें और श्रद्धापूर्वक इस पावन व्रत का पालन करें। भगवान विष्णु की कृपा आप पर सदैव बनी रहे।

Expert Astrologer

Talk to Astrologer Abhishek Soni

Get accurate predictions for Career, Marriage, Health & more

25+ Years Experience Vedic Astrology